इक वह दिन, जब खुली के नीचे अपना jaha tha ,
खुशिया थी , गम थे , मस्तियो का कारवां था ,
लड़ते थे , झगड़ते थे ,रोते हस्ते & रुठते -मनाते थे
हॉस्टल का खाना हो , या ढाबे के पराठे; सब मिल खाते थे!
होता था घर से पैसो का इन्तेजार , हरदम थी हालत खस्ती
फिर भी होती थी पहले हफ्ते में सारे ढाबो की मस्ती ,
गोदावरी की काफ्फी , साबरमती के पकोड़े या फिर गंगा की ब्रेड रोल और चाय
Library Canteen का खाना ,या फिर "युनुस भैया, आज क्या बनाए !!
दिन थे मजेदार , प्रिया front stall में जाते थे
कुछ ना था फिर भी बहुत कुछ था ... हम मुस्कुराते थे !!!
आज जमी अपनी है , आसमा अपना है और अपना सारा जहाँ है
लोगो की भीड़ है , फिर भी दोस्तों के बिन यह गुलिस्ता वीरां है !
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Tuesday, March 15, 2011
Thursday, April 1, 2010
पहले मुफलिस था,
अब चोर बन गया हूँ
पर इस मरे बाज़ार में चुराऊ भी तो क्या
वही चीजे
जिन्हें लुटा कर मैं मुफलिस बना था !!!'
- graffiti at Lohit
अब चोर बन गया हूँ
पर इस मरे बाज़ार में चुराऊ भी तो क्या
वही चीजे
जिन्हें लुटा कर मैं मुफलिस बना था !!!'
- graffiti at Lohit
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